पूरा प्रवचन
महाराज मैं रोज पूजा करता हूँ, मंत्र भी जपता हूँ। फिर भी मन अशांत रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि बेटा पूजा में शरीर बैठता है लेकिन मन अभी भी दुनिया में भागता रहता है। दीपक भगवान के सामने जलता है और भीतर चिंता जलती रहती है। हाथ माला फेरते हैं लेकिन मन पुराने अपमान, भविष्य का डर और दूसरों से तुलना गिनता रहता है। सिर्फ पूजा करना काफी नहीं है। पूजा के बाद पाँच मिनट शांत बैठो, अपनी चिंता भगवान को कहो। किसी एक बात के लिए धन्यवाद दो और जिस व्यक्ति से मन भारी है उसे भीतर से क्षमा करने की कोशिश करो। याद रखो भगवान के सामने बैठना पूजा है लेकिन मन को उनके सामने खोल देना भक्ति है। अब अगला सवाल आपका है? कमेंट में लिखिए महाराज से क्या पूछना चाहते हैं?



